29 अक्तूबर, 2014

कुशल चितेरा



है तू कुशल चितेरा
कई रंग भरता सृष्टि में
जो आँखों को रास आते
हंसते हंसते रुला जाते |
न जाने क्यूं बहुत खोजा
 कोई रंग तो ऐसा हो
जो उससे मेल न खाता हो 
उस में ही घुल जाता हो |

पर एक भी ऐसा न मिला
प्रयत्न आज भी है अधूरा
यह तेरी कूची का  कमाल
या संयोजन बेमिसाल |
हर रंग है कुछ ख़ास 
दीवाना बना जाता 
एक ही धुन लग जाती
 सब में तू ही नजर आता |

कभी एहसास नहीं होता 
 कोई  कमी रही है शेष
सब ऐसे घुल मिल गए है
सृष्टि रंगीन कर गए हैं |
यही चाहत रहती  हर पल
इन रंगीन लम्हों को जियूं
तेरी  अदभुद कृतियों को 
अंतस में सहेज कर रखूँ |

आशा