31 अगस्त, 2014

जाना चाहती हूँ


  
 


:-जाना चाहती हूँ दूर बहुत
इस भव सागर से
सब कार्य पूर्ण हो गए
जो मुझे करने थे |
अब मन नहीं लगता
किसी भी कार्य में
कोई उत्साह नहीं शेष
थके हुए जीवन में |
थोड़ा मोह बाक़ी था
बच्चों के बचपन से
उनका बचपन खो गया
बस्तों के बोझ  तले |
अब ऐसा कोई  नहीं
जिस से सांझा कर पाऊँ
अपने मन की बातें
और बाँट पाऊँ प्यार |
थका हारा शरीर
कहीं जाने नहीं देता
बोझ लगता मुझे
घर से निकलना |
अब धरती पर
बोझ बढ़ा  रही हूँ
अकर्मण्यता की मिसाल
होती जा रही हूँ |
आशा

30 अगस्त, 2014

प्रतिभा अपरिचित






यत्र तत्र बिखरी प्रतिभाएं
अपनी पहचान बना ना पातीं
आगे आना चाहतीं
पर सही मार्ग  चुन न  पातीं |
एक खोजी नजर चाहिए उनको
अपनी पहचान बनाने को
उन्हें परवान चढाने को
सब के समक्ष लाने को |
जब नजर पारखी धोखा न खाए
पूर्ण पारदर्शिता अपनाए
तभी न्याय उनके संग होगा
प्रतिभा में निखार होगा |
ऐसी प्रतिभा नायाब होगी
गहराई तक छू जाएगी
छाप ऐसी छोड़ जाएगी
बरसों बरस याद की जाएगी |
आशा

28 अगस्त, 2014

श्री गणेश

 

सुत गौरी के 
रिद्धि सिद्धि के दाता
प्रथम पूज्य |

बाल गणेश 
सवारी मूषक की 
माँ दिल हारी |

कार्य अपूर्ण 
गण नायक बिन 
नहीं संपन्न |

करो उद्धार 
आया तुम्हारे द्वार
हे लंबोदर |

मोदक बिन 
धू प दीप अधूरे
हे गणराज |

भोग लगाऊँ
 आजाओ गजानन
कामना पूर्ण |

बप्पा मोरिया
तुम विध्न हरता
जय गणेश |

गौरी नंदन
गणेश चिंतामण
 सुस्वागतम  |


आशा






27 अगस्त, 2014

नव स्वप्न


नव स्वप्न
मन ने एक स्वप्न सजोया
छोटा सा  घरोंदा बनाया
था हरियाली से भरपूर
चहु ओर बरसता नूर |
प्रातः काल द्वार  खुलते ही
सौरभ सुमन स्वागत करता
शीतल पवन आकृष्ट करता
डाल पर डाला झूला
मंथर गति से हिलता |
पास ही झरने की कलकल
पक्षियों की चहचहाहट
जल में अक्स मेरी कुटीया का
बहुत मनोरम लगता
उठने का जी ना करता |
ऊपर नीलाम्बर में
सूर्य छिपा बादलों में
उन से अटखेलियाँ करता
यदि पंख मुझे भी मिलते
उस खेल में शामिल होती
मन उमंग से भरता |
आशा